विश्व पर्यावरण दिवस पर खनियाँ में हरियाली का संकल्प: ग्रामीणों ने लगाए 200 पौधे, चीड़ के बीच उग रहा बाँज-देवदार का नया वन

रानीखेत। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर भूमि संरक्षण वन प्रभाग, रानीखेत के गगास रेंज अंतर्गत वन पंचायत खनियाँ स्थित प्रसिद्ध गोलज्यू मंदिर परिसर में वृक्षारोपण एवं जन-जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य वन संरक्षण कार्यों में जनसहभागिता बढ़ाना तथा ग्रामीणों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ना रहा।

प्रमुख बातें

  • गोलज्यू मंदिर परिसर में ग्रामीणों और वन विभाग के संयुक्त प्रयास से 200 पौधों का रोपण किया गया।
  • लगाए गए पौधों में बाँज, देवदार, काफल, पुतली, अमरूद और उतीस जैसी स्थानीय एवं उपयोगी प्रजातियाँ शामिल रहीं।
  • ग्रामीणों ने वर्षों से चली आ रही धारणाओं और मिथकों को तोड़ते हुए चीड़ बहुल क्षेत्र में चौड़ी पत्ती वाले पौधों का रोपण किया है।
  • पूर्व वर्षों में लगाए गए पौधे अब प्राकृतिक रूप से विकसित होकर वन का स्वरूप ग्रहण करने लगे हैं, जो ग्रामीणों की मेहनत और समर्पण का प्रमाण है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आने का आह्वान

कार्यक्रम में उपस्थित प्रभागीय वनाधिकारी भूमि संरक्षण वन प्रभाग, रानीखेत श्री संतोष कुमार पंत ने ग्रामीणों से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जनसहभागिता के बिना पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य को प्राप्त करना संभव नहीं है।

वनाग्नि और वन्यजीव संरक्षण पर जोर

वन क्षेत्राधिकारी गगास श्री राजीव जोशी ने ग्रामीणों से वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा में सहयोग करने की अपील की। उन्होंने विशेष रूप से गर्मियों के दौरान वनाग्नि से बचाव के लिए सतर्क रहने और सामूहिक प्रयास करने का संदेश दिया।

बड़ी संख्या में ग्रामीण और कर्मचारी रहे मौजूद

कार्यक्रम में वन विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों तथा स्थानीय ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर हरक सिंह, दीवान सिंह, पूरन सिंह, जीवन सिंह, चम्पा देवी, पुष्पा कैड़ा, तुलसी बिष्ट, साक्षी, शांति बिष्ट, हेम चन्द्र काण्डपाल, ईश्वर सिंह, रमेश चन्द्र, मदन सिंह, प्रकाश सिंह नेगी, आन सिंह बिष्ट सहित अनेक ग्रामीण एवं विभागीय कर्मचारी उपस्थित रहे।

संदेश

“एक पौधा, एक जिम्मेदारी” के संकल्प के साथ आयोजित इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि यदि ग्रामीण और वन विभाग मिलकर कार्य करें, तो चीड़ बहुल क्षेत्रों में भी विविध प्रजातियों के हरे-भरे वन विकसित किए जा सकते हैं।

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